अब आडवाणी से मिलने का मतलब आडवाणी हो जाना…

लाल कृष्ण आडवाणी का एकांत भारत की राजनीति का एकांत है। हिन्दू वर्ण व्यवस्था के पितृपुरुषों का एकांत ऐसा ही होता है। जिस मकान को जीवन भर बनाता है, बन जाने के बाद ख़ुद मकान से बाहर हो जाता है। वो आंगन में नहीं रहता है। घर की देहरी पर रहता है। सारा दिन और कई साल उस इंतज़ार में काट देता है कि भीतर से कोई पुकारेगा। बेटा नहीं तो पतोहू पुकारेगी, पतोहू नहीं तो पोता पुकारेगा। जब कोई नहीं पुकारता है तो ख़ुद ही पुकारने लगता है। गला खखारने लगता है। घर के अंदर जाता भी है, लेकिन किसी को नहीं पाकर उसी देहरी पर लौट आता है। बीच बीच में सन्यास लेने और हरिद्वार चले जाने की धमकी भी देता है मगर फिर वही डेरा जमाए रहता है।

भारतीय जनात पार्टी के संस्थापक आज विस्थापन की जिन्दगी जी रहे हैं। वो न अब संस्कृति में है न राष्ट्रवाद के आख्यान में. एकांत भारत की राजनीति का एकांत है पिछले तीन साल के दौरान जब भी अणवाणी जी को देखा एक गुनाहगार की तरह नजर आए हैं। बोलना तो चाहते हैं मगर किसी अनजान डर से चुप हो जाते हैं। मोदी टीम ने उन्हें ऐसे अलग थलग कर दिया है जैसे भाजपा से कभी उनका कोई रिश्ता ही न रहा हो।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का कहना है कि आप आणवाणी के हजारों वीडियो निकाल कर देख लीजिए ऐसा लगता है कि उनकी आवाज चली गयी हो। जैसे उन्हें किसी ने शीशे के बक्से में बंद कर दिया हो। आणवाणी का एकांत उस कमीज की तरह है जो बहुत दिनों से रस्सी पर सूख रही हो मगर कोई उतारने वाला नहीं है। बारिश में कभी भीगती है तो कभी धूप में सिकुड़ जाती है।

क्या आडवाणी एकांत में रोते होंगे? सिसकते होंगे या कमरे में बैठे बैठे कभी चीखने लगते होंगे, किसी को पुकारने लगते होंगे? बीच बीच में उठकर अपने कमरे में चलने लगते होंगे, या किसी डर की आहट सुन कर वापस कुर्सी पर लौट आते होंगे? बेटी के अलावा दादा को कौन पुकारता होगा? क्या कोई मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या साधारण नेता उनसे मिलने आता होगा? आज हर मंत्री नहाने से लेकर खाने तक की तस्वीर ट्वीट कर देता है। दूसरे दल के नेताओं की जयंती की तस्वीर भी ट्वीट कर देता है। उन नेताओं की टाइमलाइन पर सब होंगे मगर आडवाणी नज़र नहीं आएंगे। सबको पता है। अब आडवाणी से मिलने का मतलब आडवाणी हो जाना है।

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