जिउतिया व्रत की तैयारी शुरू, संतान की लम्‍बी आयु के लिए महिलाएं करेंगी निर्जला व्रत

जिउतिया का पर्व मंगलवार 12 सितंबर से शुरू हो रहा है। जिले में इस व्रत की तैयारी शुरू हो गई है। यह व्रत महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु की कामना को लेकर करती हैं। जिउतिया व्रत में आज के दिन नहाय-खाय की परम्‍परा है। जिसके बाद कल से यानी बुधवार को संतान की लम्‍बी आयु के लिए उपवास रखा जाता है और पूजा-अर्चना की जाती है। कल निर्जला उपवास किया जायेगा। इस व्रत में पानी तक नहीं पीना होता है. इस व्रत को आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रदोष काल में किया जाता हैं।

माता-पिता की इच्‍छा होती है‍ कि उनके बच्‍चे खूब तरक्‍की करें. उनकी आय में बढ़ोतरी हो और उनकी उम्र लम्‍बी है। इसकी कामना के साथ दो दिवसीय जीवित पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत आज से शुरू हो गया है। इस व्रत में आज के दिन नहाय-खाय की परम्‍परा है। जिसके बाद कल से यानी बुधवार को संतान की लम्‍बी आयु के लिए उपवास रखा जाता है और पूजा-अर्चना की जाती है। कल निर्जला उपवास किया जायेगा। इस व्रत में पानी तक नहीं पीना होता है। इस व्रत को आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रदोष काल में किया जाता हैं।

कहा जाता है कि यह व्रत माताओं द्वारा अपने बच्‍चों की आयु, निरोगी काया तथा उनके कल्याण के लिए किया जाता है. इस व्रत को कई जगहों पर ‘जीतिया’ या ‘जीउतिया’, ‘जिमूतवाहन व्रत’ भी कहा जाता है.

ज्योतिषाचार्य दिव्यांशु शेखर ने बताया कि संतान की मंगलकामना का पर्व जिउतिया 12 सितंबर से शुरू हो रहा है। इसी दिन नहाय खाय है। माताएं स्नान के बाद एक ही बार भोजन करती हैं। वही जिउतिया व्रत 13 सितंबर को है, इस दिन माताएं निर्जला व्रत करेंगी। 14 सितंबर बृहस्पतिवार को व्रत का पारण सूर्योदय से दोपहर 12 बजे तक किया जाएगा। उन्होंने बताया कि जिउतिया व्रत के साथ गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की कथा जुड़ी हुई है। जीमूतवाहन अत्यंत दयालु, परक्रमी और उदार थे। कहा जाता है कि बचपन मे ही मिले राजपाट को त्याग कर राजकुमार जीमूतवाहन पिता की सेवा के लिए वन मे चले गए।

इस व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी हैं, जो माताएं यह व्रत रखती हैं उन्‍हें जीमूतवाहन की कथा जरूर सुननी चाहिए। आइए आपको संक्षेप में यह कथा बताते हैं- जीमूतवाहन गंधर्वों के राजकुमार थे, वह बड़े ही उदार व्‍यक्ति थे। इनके पिता ने वृद्धाआश्रम जाने की सोची। जाने से पहले इन्‍होंने जीमूतवाहन को राजा के सिहांसन पर बैठा दिया, लेकिन जीमूतवाहन का मन राजकाज में नहीं लगता था। जिससे विमुख होकर जीमूतवाहन ने अपने छोटे भाइयों को राजकाज सौंप दिया और खुद जंगल में अपने पिता के पास चले आए। यहां आकर उन्‍होंने मलयवती नाम की एक राजकुमारी से विवाह भी कर लिया।

एक दिन भ्रमण के दौरान नागवंशी वृद्ध महिला विलाप करते हुए दिखाई दी। राजकुमार जीमूतवाहन ने जब कारण पूछा, तब नागवंशी वृद्धा ने बताया कि आज गरुड़ मेरा बेटा शंखचूड़ को भोजन के रूप में भक्षण करने वाला है। यह सून जीमूतवाहन ने खुद गरूड़ के साथ जाने का फैसला किया. अब गरूड़ आया और शंखचूड़ को उठाकर ले जाने लगा, तभी उसे आभास हुआ कि वह शंखचूड़ की जगह किसी व्‍यक्ति को ले आया है. अब गरूड़ ने जीमूतवाहन से पूछा कि तुम कौन हो. जीमूतवाहन ने कहा कि मैं शंखचूड़ की माता को पुत्र वियोग से बचाना चाहता हूं, तुम भोजन स्‍वरूप मेरा भोग कर सकते हो. तभी से इस व्रत का प्रचलन हुआ और यह कथा प्रचलित हुई. तब राजकुमार जीमूतवाहन ने शंखचूड की जगह स्वयं को गरुड़ के हाथों मरने के लिए तैयार हो गए। उनके इस दयालुता पराक्रम तथा उदारता को देखते हुए गरुड़ ने कभी किसी नाग को ना मारने का वरदान दिया।

उस दिन आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि थी। उस दिन से माताएं अपने संतान की जीवन रक्षा के लिए जीमूतवाहन की पूजा आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखकर करती हैं। इस प्रकार करें पूजा आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखकर सांय प्रदोष काल मे जीमूतवाहन की षोडशोपचार विधि से पूजा कर व्रत सुननी चाहिए। उसके पश्चात ब्राह्मण को दक्षिणा देना चाहिए। ऐसा करने से संतान के जीवन की रक्षा होती है। व्रत का तिथिवार विधान 12 सितंबर 2017-(मंगलवार)- नहाय खाय 13 सितंबर 2017-(बुधवार)- खर जितिया 14 सितंबर 2017-(बृहस्पतिवार)-पारण

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