BRICS घोषणा पत्र में जैश-ए-मोहम्मद का नाम, मसूद पर बैन के सवाल पर चीन ने साधी चुप्पी

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में पहली बार पाकिस्तान के आतंकी समूहों का नाम शामिल किया जाना भारतीय कूटनीति खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत बड़ी जीत है। पीएम इससे पहले जी -20 से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक के हर बहुपक्षीय मंच से आतंकवाद पर दुनिया के दोहरे मापदंड पर हमला बोल चुके हैं।
पिछले साल गोवा में ब्रिक्स के आठवें शिखर सम्मेलन में भारत ने आतंकवाद के खतरे के संदर्भ में पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी लेकिन चीन के अड़ियल रवैये से यह संभव नहीं हो पाया था। उस अधूरे काम को भारत ने चीन में पूरा कर दिखाया। इससे चीन पर भारी दबाव पड़ेगा कि वह जैश के सरगना और मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मौलाना मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने में अड़ंगा न लगाए।

घोषणापत्र में जैश और लश्कर का नाम लिए जाने से सिर्फ पाकिस्तान की ही कलई नहीं खुली है बल्कि चीन का दोमुंहापन भी उजागर हुआ है। अब उसके लिए आतंकवाद पर पाकिस्तान का बचाव करना आसान नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वह मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई के भारत की कोशिशों का भी विरोध नहीं कर पाएगा क्योंकि ब्रिक्स घोषणापत्र के मद्देनजर ऐसा करने से उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

पिछले साल मसूद अजहर के खिलाफ भारत की कोशिश को नाकाम करने के बाद चीन इस साल भी अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के ऐसे ही एक प्रस्ताव को रोक चुका है। अब अक्तूबर में इसकी समीक्षा होने वाली है। माना जाता है कि चीन इसका विरोध नहीं कर पाएगा और आखिरकार भारत की कोशिशें रंग लाएंगी। मालूम हो कि भारत के दबाव में अमेरिका ने हाल ही में हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकी घोषित कर चुका है। इस लिहाज से ब्रिक्स घोषणापत्र के रूप में उसे दूसरी कामयाबी मिली है।

चीन ने साधी चुप्पी 
घोषणापत्र में पाकिस्तान के आतंकी समूहों का नाम शामिल किए जाने के बावजूद चीन ने मसूद अजहर पर पाबंदी और कार्रवाई के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। संवाददाताओं द्वारा बार-बार पूछे जाने पर सिर्फ यही जवाब मिला कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में हमारा स्टैंड स्पष्ट है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा कि उन्हें घोषणापत्र नहीं देखा है और उसके विषय में कुछ नहीं बोलेंगे।

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