डायबिटीज है तो थोड़ा थोड़ा खायें

स्वस्थ रहना सभी की चाहत हाेती है, पर उसके लिए प्रयास कुछ ही लोग करते हैं. लोग कुछ भी खा लेते हैं, जिससे शरीर को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता है. इससे वे कई रोगों से ग्रसित होते रहते हैं, जिनमें मधुमेह काफी आम है. डायबिटीज के कारण कई अन्य बीमारी भी हो सकती है, इसलिए बेहतर होगा कि यदि डायबिटीज हो, तो खान-पान और जीवनशैली को सुधारें.
डायबिटीज कई लक्षण लेकर आते हैं जैसे-अत्यधिक पेशाब का होना, बार-बार भूख और प्यास लगना, वजन कम होना. मेरे पास जो डायबिटीज के मरीज आते हैं, उनकी उम्र 15-70 वर्ष होती है. कम उम्र में डायबेटिक परेशानी को टाइप-1 जुवेलाइन डायबिटीज कहते हैं. इसमें पैनक्रियाज के बीटा सेल से इन्सुलिन  का स्राव  नहीं  होता है. इसलिए  इन्सुलिन इन्जेकशन से देना पड़ता है. 30-33 की उम्र इस बीमारी को टाइप-2 डायबेटिक मेलीटस कहते हैं. इसमें बीटा सेल से इन्सुलिन कम या नहीं स्रावित करते हैं. तीन तरह के न्यूट्रीएंट्स होते हैं- वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट.
वसा : वसा की छोटी मात्रा ब्लड सुगर को प्रभावित नहीं करती, लेकिन पाचन क्रिया को धीमा कर देती है. इससे खून में  चीनी की मात्रा बढ़ती है.
प्रोटीन : प्रोटीन की मात्रा ब्लड ग्लूकोज को प्रभावित नहीं करती है, जब तक कि अधिक मात्रा में न लिया जाये. 10-12 साल के लड़कों एवं लड़कियों के लिए 54-57 ग्राम प्रोटीन की जरूरत  होती है. 13-15 साल के लड़कों एवं लड़कियों  के लिए 70-65  ग्राम प्रोटीन की जरूरत है. इसमें दी गयी मात्रा में 50% प्रथम प्रकार के होने चाहिए, जिसमें सभी तरह की जरूरी एमीनो एसिड पाये जाते हैं.
कार्बोहाइड्रेट : कार्बोहाइड्रेट डायबेटिक मरीजों को ज्यादा प्रभावित करते हैं. सभी तरह के कार्बोहाइड्रेट ब्लड में जाकर सुगर में बदल जाते है. कार्बोहाइड्रेट की गणना टाइप-1 डायबेटिक मरीज  के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि यह बच्चों में  इन्सुलिन की मात्रा सुनिश्चित करती हैं. अमूमन एक 13-15 वर्ष के बच्चे के लिए 2450 से 2060 कैलोरी की जरूरत होती है. कैलोरी का विभाजन प्रत्येक मील के हिसाब से किया जाता है.एक चपाती, एक कटोरी चावल,  80 कैलोरी देता है.

एक कप दूध व एक कप दही 100 कैलोरी देता है. टाइप-2 डायबीटीज को NIIDM भी कहा जाता है. यह 30 साल की उम्र में भी प्रभावित करने लगता है. ब्लड में सुगर की मात्रा काफी बढ़ जाती है. इसमें एकसाथ ज्यादा खाने के बजाय थोड़े-थोड़े अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा खाएं. खाने में  बहुत सारे फल सब्जी, थोड़ा सैचुरेटेड वसा, कम नमक की मात्रा पर्याप्त प्रोटीन ब्लड फैट, उच्च रक्तचाप एवं वजन को कम करने में सहायता करती है, जिससे ब्लड सुगर नियंत्रित रहता है. प्रोटीन का निर्धारण उसके शरीर के वजन के हिसाब से किया जाता है. प्रोटीन दूध, दही, अंडा, दाल, सोयाबीन, बादाम आदि चीजों से प्राप्त किया जा सकता है. डायबिटीज के मरीज के लिए जटिल कार्बोहाइड्रेट का चुनाव करना चाहिए. जैसे- साबुत अनाज, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि. इनमें फाइबर की मात्रा होती हैं, जो पाचन की प्रक्रिया को धीमा करता है व सर्करा की मात्रा को खून  में बढ़ने नहीं देता है. फल भी वैसे खाएं, जिससे गलूकोज की मात्रा न बढ़े. इसके लिए लो ग्लासिमिक इंडेक्स फल चुनें. जैसे- सेब, अमरूद, पपीता, जामुन, नाशपाती, मौसमी, संतरा आदि. इन फलों में सॉल्यूबल फाइबर पाया जाता है, बेल, अंगूर, आम, लीची, तरबूज, खजूर आदि सर्करा अधिक होता है, इसलिए इसका सेवन अधिक नहीं करना चाहिए.

SHARE